Sunday, February 20, 2011

ज़िन्द्गी

क्षितिज को छुता आस्मान,
जगाऐ है दिल मे यह अरमान,
रंगो के बादलो पर हॉस्लो के पन्ख फैलाकर तो देखो

अपनी बाहें खोले है समन्दर,
दूर दरास्त है मुश्कीलो के बव्ंदर,
लहेरो की आगोश मे अपनी कश्ती ऊतारकर तो देखो

मीलो तक बिछी है धरती,
कठीनाईयो से आगाह है करती,
इसके आंचल मे अपने कदम रखकर तो देखो

माना मूश्कील है ज़िन्दगी,
फिर भी मुखातिर है ज़िन्द्गी,
ल्म्हो के दाव-पेच आज़्माकर तो देखो

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